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18.6.10

ABOUT US

हरियाणा के जिला हिसार से 35 किलोमीटर दूर राजस्थान सीमा पर बसे कस्बे मंडी आदमपुर की यह पहली वैबसाइट है। इसमें आप मंडी आदमपुर के साथ-साथ अन्य कस्बों के समाचार व महत्वपूर्ण घटनाओं से रूबरू होंगे। इसके अलावा मंडी आदमपुर कस्बे के जर्रे-जर्रे से भी आपको अवगत करवाने की पूरी कोशिश की जाएगी ताकि आप घर बैठे ही कोई भी जानकारी एक क्लिक के साथ पा सकें। वही इस वैबसाइट में विद्यार्थियों के लिए शिक्षा व रोजगार, व्यापारियों के लिए व्यापार व भाव, किसानों के लिए खेतीबाड़ी, धार्मिक आस्था रखने वालों के लिए धार्मिक साहित्य, मनोरंजन, बच्चों के लिए विशेष सामग्री तथा अन्य महत्वपूर्ण तथ्यों से भी आपको अपडेट करते रहेंगे। आशा है कि कस्बे की इस पहली वैबसाइट को आप अपना भरपूर समर्थन व सहयोग देकर हमें और अच्छा करने के लिए प्रेरित करेंगे।

Chief Editor:- N.S.Noonia
Contact No. 094168-67430
Address:- Shiv Colony, M.Adampur
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Sub Editor:- Kapil Bhartiya
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Guest Editor:- Surendra Noonia
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                                Legal Consultants:-


Rakesh Kumar Rana
Contact No. 09068028029
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Supreme Court of India, New Delhi


Naveen Kumar Rana  
Contact No.09467428029
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Distt.Courts,Hisar
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LOCAL WORDS

आधुनिकता के साथ हम आगे तो बढ़ रहे हैं लेकिन आज की युवा पीढ़ी व भविष्य की पीढ़ी अपनी संस्कृति की जड़ों से दूर होती जा रही है। आज हालत तो यह है कि दादा द्वारा बोले गए शब्दों को बच्चे समझ ही नहीं पाते। यह कॉलम स्थानीय भाषा(बागड़ी) को समर्पित है जिसमें बागड़ी शब्दों के अर्थों को विस्तार से समझाया जाएगा। उम्मीद है कि आदमपुर डॉट इन की यह पहल दर्शकों को पसंद आएगी।

देशी शब्द हिंदी में अर्थ
तिंदर - नखरा
जुगाड़ - समाधान
टिंगर - छोटा बच्चा
अलबाद - समस्या
तीवण - तड़का लगाई हुई सब्जी
ऐंडी - गजब
अड़ंगो - सामान
खंडवा - सिर पर बांधा जाने वाला साफा
पोतडिय़ा - नवजात शिशुओं के नैपकीन
चूंटियो - मक्खन
बटाऊ - दामाद
बीन-बीनणी - पति-पत्नी
लुगाई - महिला
लत्ता - कपड़े
कढावणी - दूध गर्म करने के लिए मिट्टी का बना बर्तन
बिलौणा - लस्सी बनाने के लिए बर्तन
आसंग - तबीयत
आथण - शाम
झांझरका - अल सुबह
तावल - जल्दी
डांगर - पशु
पाडकी - भैंस की बच्ची
पाडिया - भैंस का बच्चा
खागड़ - आवारा बैल
हारो - चाट, दूध आदि गर्म करने का चूल्हा
तावड़ो - धूप
दीदा - आंख
भींत - दीवार
कुवाड़ - दरवाजा
माची - चारपाई
डाकर - उल्टी आना
झुंआरी - दामाद को दी जाने वाली राशि
जणेत - बारात
सुमठणी - शादी में बेटी-दामाद को दिए जाने वाले सामान की रस्म
सोड़ - रजाई
दायजा - दहेज
बनड़ो - दूल्हा
खुरड़ा - पैर
लोगड़ - रूई
डेडर - मेंढक
गंडक - कुत्ता
कलेवा - नाश्ता
गंठिया - प्याज
टिक्कड़ - रोटी

LIFE & RELIGION

माला जपने से क्या फायदा ?

जप किसी शब्द अथवा मंत्र को दोहराने की क्रिया ही नहीं है। यह पूजा-पाठ की परंपरा का हिस्सा है तो विज्ञान भी। जब हम किसी शब्द को बार-बार दोहराते हैं तो उसे जप करना कहते हैं। पूजा पद्धति में जप के माध्यम से ईश्वर के स्वरूप पर ध्यान केंद्रित किया जाता है। राम, कृष्ण, शिव, दुर्गा, हनुमान आदि देवताओं के जप की परंपरा मिलती है। जप के माध्यम से भीतरी शक्ति को जागृत किया जा सकता है। आइए, जानें जप से किस तरह हम नई ऊर्जा से भर सकते हैं...।
जप के प्रकार-जप करने के तीन तरीके हैं-
वाचिक- जब किसी शब्द या मंत्र को आवाज के साथ दोहराया जाता है।
उपांशु- मुंह से आवाज नहीं निकालते हुए जीभ (जुबान) से शब्द को दोहराना।
मानसिक- केवल मन ही मन किसी शब्द या मंत्र को दोहराना।

जप के फायदे - जप करने से हमारे अंदर सोई हुई आध्यात्मिक शक्ति जागती है। जिससे पूजा में होने वाली अनुभूति को अधिक निकटता से अनुभव किया जा सकता है। ईश्वर की अनुभूति के नजदीक पहुंचने के लिए सभी धर्मों-संप्रदायों में जप का तरीका अपनाया गया है। चैतन्य महाप्रभु ने जप को काफी महत्व दिया। श्री रामकृष्ण परमहंस के अनुसार एकाग्र होकर प्रभुनाम का जप करने से उनके रूप के दर्शन और साक्षात्कार भी होता है। वैज्ञानिक दृष्टिï से भी जप के प्रभाव सिद्ध पाए गए हैं। सामान्यत: कठिन परिस्थितियों में हम अचानक भगवान का नाम लेने लगते हैं जिससे हममें कुछ शक्ति आती है, कुछ राहत मिलती है, एक अनजानी सुरक्षा की भावना उपजती है। जब अचानक शुरू हुए जप का इतना प्रभाव होता है तो नियमित जप की शक्ति का अनुमान लगाया जा सकता है।





शंख का पूजा में महत्व
हिंदू मान्यता के अनुसार कोई भी पूजा, हवन, यज्ञ आदि शंख के उपयोग के बिना पूर्ण नहीं माना जाता है। धार्मिक शास्त्रों के अनुसार शंख बजाने से भूत-प्रेत, अज्ञान, रोग, दुराचार, पाप, दुषित विचार और गरीबी का नाश होता है। शंख बजाने की परंपरा प्राचीन काल से चली आ रही है। महाभारत काल में श्रीकृष्ण द्वारा कई बार अपना पंचजन्य शंख बजाया गया था।आधुनिक विज्ञान के अनुसार शंख बजाने से हमारे फेफड़ों का व्यायाम होता है, श्वास संबंधी रोगों से लडऩे की शक्ति मिलती है। पूजा के समय शंख में भरकर रखे गए जल को सभी पर छिड़का जाता है जिससे शंख के जल में कीटाणुओं को नष्ट करने की अद्भूत शक्ति होती है। साथ ही शंख में रखा पानी पीना स्वास्थ्य और हमारी हड्डियों, दांतों के लिए बहुत लाभदायक है। शंख में कैल्शियम, फास्फोरस और गंधक के गुण होते हैं जो उसमें रखे जल में आ जाते हैं





आरती क्यों और कैसे?
पूजा के अंत में हम सभी भगवान की आरती करते हैं। आरती के दौरान कई सामग्रियों का प्रयोग किया जाता है। इन सबका विशेष अर्थ होता है। ऐसी मान्यता है कि न केवल आरती करने, बल्कि इसमें शामिल होने पर भी बहुत पुण्य मिलता है। किसी भी देवता की आरती करते समय उन्हें 3बार पुष्प अर्पित करें। इस दरम्यान ढोल, नगाडे, घडियाल आदि भी बजाना चाहिए। एक शुभ पात्र में शुद्ध घी लें और उसमें विषम संख्या [जैसे 3,5या 7]में बत्तियां जलाकर आरती करें। आप चाहें, तो कपूर से भी आरती कर सकते हैं। सामान्य तौर पर पांच बत्तियों से आरती की जाती है, जिसे पंच प्रदीप भी कहते हैं। आरती पांच प्रकार से की जाती है। पहली दीपमाला से, दूसरी जल से भरे शंख से, तीसरा धुले हुए वस्त्र से, चौथी आम और पीपल आदि के पत्तों से और पांचवीं साष्टांग अर्थात शरीर के पांचों भाग [मस्तिष्क, दोनों हाथ-पांव] से। पंच-प्राणों की प्रतीक आरती हमारे शरीर के पंच-प्राणों की प्रतीक है। आरती करते हुए भक्त का भाव ऐसा होना चाहिए, मानो वह पंच-प्राणों की सहायता से ईश्वर की आरती उतार रहा हो। घी की ज्योति जीव के आत्मा की ज्योति का प्रतीक मानी जाती है। यदि हम अंतर्मन से ईश्वर को पुकारते हैं, तो यह पंचारतीकहलाती है। सामग्री का महत्व आरती के दौरान हम न केवल कलश का प्रयोग करते हैं, बल्कि उसमें कई प्रकार की सामग्रियां भी डालते जाते हैं। इन सभी के पीछे न केवल धार्मिक, बल्कि वैज्ञानिक आधार भी हैं।
कलश-कलश एक खास आकार का बना होता है। इसके अंदर का स्थान बिल्कुल खाली होता है। कहते हैं कि इस खाली स्थान में शिव बसते हैं।
यदि आप आरती के समय कलश का प्रयोग करते हैं, तो इसका अर्थ है कि आप शिव से एकाकार हो रहे हैं। किंवदंतिहै कि समुद्र मंथन के समय विष्णु भगवान ने अमृत कलश धारण किया था। इसलिए कलश में सभी देवताओं का वास माना जाता है।
जल-जल से भरा कलश देवताओं का आसन माना जाता है। दरअसल, हम जल को शुद्ध तत्व मानते हैं, जिससे ईश्वर आकृष्ट होते हैं।
नारियल- आरती के समय हम कलश पर नारियल रखते हैं। नारियल की शिखाओं में सकारात्मक ऊर्जा का भंडार पाया जाता है। हम जब आरती गाते हैं, तो नारियल की शिखाओं में मौजूद ऊर्जा तरंगों के माध्यम से कलश के जल में पहुंचती है। यह तरंगें काफी सूक्ष्म होती हैं।
सोना- ऐसी मान्यता है कि सोना अपने आस-पास के वातावरण में सकारात्मक ऊर्जा फैलाता है। सोने को शुद्ध कहा जाता है।
यही वजह है कि इसे भक्तों को भगवान से जोडने का माध्यम भी माना जाता है।
तांबे का पैसा- तांबे में सात्विक लहरें उत्पन्न करने की क्षमता अधिक होती है। कलश में उठती हुई लहरें वातावरण में प्रवेश कर जाती हैं। कलश में पैसा डालना त्याग का प्रतीक भी माना जाता है। यदि आप कलश में तांबे के पैसे डालते हैं, तो इसका मतलब है कि आपमें सात्विक गुणों का समावेश हो रहा है।
सप्तनदियोंका जल-गंगा, गोदावरी,यमुना, सिंधु, सरस्वती, कावेरीऔर नर्मदा नदी का जल पूजा के कलश में डाला जाता है। सप्त नदियों के जल में सकारात्मक ऊर्जा को आकृष्ट करने और उसे वातावरण में प्रवाहित करने की क्षमता होती है। क्योंकि ज्यादातर योगी-मुनि ने ईश्वर से एकाकार करने के लिए इन्हीं नदियों के किनारे तपस्या की थी। सुपारी और पान- यदि हम जल में सुपारी डालते हैं, तो इससे उत्पन्न तरंगें हमारे रजोगुण को समाप्त कर देते हैं और हमारे भीतर देवता के अच्छे गुणों को ग्रहण करने की क्षमता बढ जाती है। पान की बेल को नागबेलभी कहते हैं।
नागबेलको भूलोक और ब्रह्मलोक को जोडने वाली कडी माना जाता है। इसमें भूमि तरंगों को आकृष्ट करने की क्षमता होती है। साथ ही, इसे सात्विक भी कहा गया है। देवता की मूर्ति से उत्पन्न सकारात्मक ऊर्जा पान के डंठल द्वारा ग्रहण की जाती है।
तुलसी-आयुर्र्वेद में तुलसी का प्रयोग सदियों से होता आ रहा है। अन्य वनस्पतियों की तुलना में तुलसी में वातावरण को शुद्ध करने की क्षमता अधिक होती है।

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क्‍या है सीएनजी
सीएनजी यानि कि संपीडित प्राकृतिक गैस (कंप्रेस्‍ड नेचुरल गैस) प्राकृतिक रूप से पाई जाने वाली अति ज्वलनशील गैस को अत्‍यधिक दबाव में रखने से बने तरल को कहते हैं। धरती के बहुत नीचे पाई जाने वाली यह गैस हवा से भी हल्‍की होती है। इसलिए इसके इस्‍तेमाल में सबसे बड़ी समस्‍या इसे स्‍टोर करने में आती है, जिसके लिए बड़ी जगह की जरूरत होती है।यही कारण है कि वाहनों में भी अतिरिक्‍त जगह की जरूरत होती है। लेकिन इस पर काम करने वाले वैज्ञानिकों का दावा है कि आने वाले सालों में इस समस्‍या पर काबू पा लिया जाएगा। सीएनजी का न तो कोई अपना रंग होता है, न गंध और न ही इसमें किसी प्रकार का जहर होता है। यह डीजल एवं पेट्रोल दोनों तरह के इंजनों में प्रयोग की जाती है। चूंकि सीएनजी डीजल एवं पेट्रोल की तुलना में कार्बन डाइऑक्‍साइड, नाइट्रोजन ऑक्‍साइड और जैविक गैसें कम उत्‍सर्जित करती है, इसलिए पर्यावरण के लिहाज से इसे उपयुक्‍त माना जाता है। यही कारण है कि विश्‍व के कई देश सीएनजी के प्रयोग के लिए जनता को प्रोत्‍साहित कर रहे हैं।इस समय दुनिया भर में करीब 125 लाख वाहन सीएनजी से चलाए जा रहे हैं। भारत में इनकी संख्‍या करीब 8 लाख बताई जाती है। एक अनुमान के मुताबिक साल 2020 तक सीएनजी से चलाए जाने वाले वाहनों की संख्‍या बढ़कर 270 लाख तक पहुंच जाएगी। वाहनों में इस गैस को प्रयोग करने के लिए 200 से 250 किलोग्राम प्रति वर्ग सेमी त‍क दबाया जाता है। ऐसा इसलिए किया जाता है ताकि यह इंजन के दहन प्रकोष्‍ठ में सही दबाव के साथ प्रवेश कर सके। प्राकृतिक गैस की तरह ही मीथेन, ईथेन और प्रोपेन सीएनजी के अवयव हैं।

प्राकृतिक गैस से वाहन चलाने का इतिहास

प्राकृतिक गैस से वाहन चलाने की शुरुआत 1930 में अमरीका से हुई। इसके बाद 1950 के आसपास इसके प्रयोग मे लोगों की रुचि बढ़ती गई। आगे चलकर प्राकृतिक गैस से वाहन चलाने का प्रचलन बढ़ता गया।

आइए जानें क्या है नक्सलवाद

1967 में सशस्त्र क्राति के माध्यम से किसानों और मजदूरों को उनका हक दिलाने के लिए पश्चिम बंगाल के नक्सलबाड़ी नामक स्थान पर एक आंदोलन की शुरूआत की गई थी। जिसे उसके स्थान के नाम पर नक्सलवाद आंदोलन कहा गया। इसके सिद्धांत मार्क्सवाद से प्रभावित थे, जबकि तरीके माओवाद से। माओ चीन के सश्सत्र क्रांति के प्रसिद्ध नेता थे जिनका ऐतिहासिक कथन था राजनीतिक सत्ता बंदूक की नली से निकलती है। इसके अलावा राजनीति रक्तहीन युद्ध है, जबकि युद्ध रक्त से भरी राजनीति।

मिथुन दा और नक्सलवादकथित तौर पर ये भी माना जाता है कि फिल्म एक्टर मिथुन चक्रवर्ति भी नक्लबाडी आंदोलन से जुड़े रहे। उनका कोडनेम राणा रेजा था, पुणे में फरारी के दिनों में ही उन्होंने एफटीटीआई पुणे की प्रवेश परीक्षा दी थी, जिसमें सफल होने के बाद आंदोलन से उनका जुड़ाव धीरे धीरे खत्म हो गया।

देशभर में पैर पसार चुका है नक्सलवाद

शुरूआत में यह आंदोलन केवल पश्चिम बंगाल में चलाया जा रहा था। लेकिन पिछले कुछ सालों में देश के बाकी भागों में भी यह फैलने लगा। खासकर पूर्वी भारत, छत्तीसगढ़ और आंध्रप्रदेश में भी माओवादियों के साथ नक्सलवादी अपने पैर पसारने लगे।

2009 के आंकड़ो के अनुसार नक्सली देश के 20 राज्यों की 220 जिलों में सक्रीय हैं। वह प्रमुख तौर पर रेड कॉरिडोर कहे जाने वाले क्षेत्रों में सक्रिय हैं। भारतीय खुफिया एजेंसी रॉ के मुताबिक देश में 20000 नक्सली काम कर रहे हैं। पिछले दिनों प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भी नक्सलियों को देश के लिए सबसे बड़ा अंदरूनी खतरा बता चुके हैं। फरवरी 2009 में केंद्र सरकार ने नक्सलियों के खिलाफ छत्तीसगढ़, उड़ीसा, आंध्रप्रदेश, माहाराष्ट्र, झारखंड, बिहार, उत्तरप्रदेश और पश्चिम बंगाल में जवाबी कार्रवाई के संयुक्त ऑपरेशन की घोषणा की थी।


THE ORIGINAL PHOTOGRAPH OF JHANSI KI RANI 1850?


अब तक आपने झांसी की रानी की तस्वीर पुस्तकों में स्केच या कैनवास पर ब्रश से उकेरे प्रयासों के सहारे ही देखा होगा, लेकिन भारत में रानी की रानी
लक्ष्मीबाई की मूल तस्वीर जिसको आप शायद ही कभी देखें हो।जी हां ये है झांसी की रानी की 1850 मैं खींची गई मूल तस्वीर, जिसे सन 1850 में अंग्रेज फोटोग्राफर हॉफमैन ने लिया था। पिछले दिनों विश्व फोटोग्राफी दिवस यानि 19 अगस्त को पद्मश्री वामन ठाकरे द्वारा खींचे गए छायाचित्रों, कैनवास पे उकेरे चित्रों, लेखन कार्य और अन्य कलाकृतियों की प्रदर्शनी का आयोजन भोपाल में किया गया था। इस प्रदर्शनी में उनके विशेष आग्रह पे अहमदाबाद के एक एंटिक संग्रहकर्ता ने यह छायाचित्र भेजा था।
इस फोटो को श्री वामन ने प्रदर्शनी में दिखाकर लोगों को आश्चर्यचकित कर दिया। क्योंकि लक्ष्मीबाई के मूल फोटो को आज तक शायद ही किसी ने देखा होगा। अभी तक ऐसा माना जाता रहा है कि इस दुनिया में रानी लक्ष्मीबाई की तस्वीर उपलब्ध नहीं है। लेकिन इस तस्वीर के एकाएक सामने आ जाने से यह साफ हो गया कि रानी की तस्वीर अभी भी उपलब्ध है


SMILE PLZ

संता की बीवी को बच्चा होने वाला था। जब प्रसव पीड़ा शुरू हुई, तो पड़ोसियों ने संता के मोबाइल पर फोन करके बता दिया कि वे उसकी बीवी को फलां अस्पताल ले जा रहे हैं। संता आनन-फानन में सब काम छोड़-छोड़कर उस अस्पताल पहुंच गया।
वहां पहुंचकर वह चिल्लाने लगा : मेरी बीवी को बच्चा होने वाला है, मेरी बीवी को बच्चा होने वाला है।
नर्स बंतानी उससे बोली : कृपया शांत रहिए, अभी तो आपकी बीवी यहां पहुंची भी नहीं है। संता : ओह, मैं सीधे अस्पताल गया। मैंने सोचा कि इस महत्वपूर्ण मौक़े पर हम मियां-बीवी में से किसी एक को तो यहां मौजूद रहना ही चाहिए।
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संता सड़क पर बेहोश हो गया। उसके इर्द-गिर्द भीड़ जा हो गई। लोग उसे होश में लाने के लिए अपनी-अपनी सलाह देने लगे। बुढ़िया बंता बोली: इसे ब्रांडी दे दो। किसी ने कहा कि मुंह में पानी डालो। बुढ़िया फिर बोली: अरे, इसके मुंह में दो घूंट ब्रांडी डाल दो। तभी कोई कहने लगा कि इसे अस्पताल ले चलो। इतने में बेहोश पड़ा संता उठ बैठा और कहने लगा: आप सब अपनी बकवास बंद कीजिए और उस बेचारी बुढ़िया की बात भी सुनिए।
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एक व्यक्ति अपने दोस्त की मौत के बाद दोस्त की पत्नी के पास गया और बोलाः क्या में अपने दोस्त की जगह ले सकता हूं।
दोस्त की बीवी बोलीः मुझे कोई ऐतराज नहीं, बस आप कब्रिस्तान वालों से पूछ लो?